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Tuesday, September 28, 2021
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Movie Review: Kkkk….. किरन – By Actor Alok Pandey

हर बार शाहरुख नही मरेगा….

यह 12:30 मिंट की फ़िल्म जिसमे मुख्य रोल निभा रहे बहुत ही प्रतिभाशाली एक्टर Alok Pandey जी।

इस शॉर्ट फ़िल्म की शुरुआत एक डायलॉग “शाहरख को मरना नही चाहिएँ था” और इसका अंत जो सस्पेंस में था वाकई क़ाबिले तारीफ़ काम था वैसे तो कई शार्ट फ़िल्म बनती है लेकिन कुछ शार्ट फ़िल्म ऐसी बनती है जो तीन घण्टे की फ़िल्म जैसी लगती है कहने का मतलब kkkk….. किरन फ़िल्म ऐसी फिल्म है जिसे हम यदि तीन घण्टे लगातार भी देख ले तो हमें ऐसा लगेगा कि हमने अब तक फ़िल्म देखी नही इतना उम्दा काम इतना उम्दा अभिनय दर्शाया गया है फ़िल्म में।

जब नलिन सिंह (जो कि एक डॉक्टर का रोल निभा रहें हैं फ़िल्म में)आलोक पांडे(जो कि मुख्य किरदार और प्रेमी का रोल निभा रहें हैं)से पूछते है”यदि तुम शाहरुख की जगह होते तो अब यहाँ से फ़िल्म में ओर बदलाव आने शुरू हो जाते है”आलोक पांडे अपने हाथों में सिगरेट लिए गार्डन के बेंच पर बैठे नज़र आते है और तब ही वहाँ दीक्षा गोस्वामी(जो कि फ़िल्म में मुख्य अभिनेत्री का रोल निभा रही है और सस्पेंस भरा प्रेम भी)आ जाती है और उनकी तरफ से गार्डन में सिगरेट पीने को लेकर तू-तड़ाक हो जाती है मगर आलोक पांडे चुप से सुनते है क्यूँकि उनकी नज़रें उन्हें प्रेम दृष्टि से निहारने लगती है”लेकिन आप जब फ़िल्म देखना शुरू करेंगे तब आपको लगेगा कि यह प्रेम भी शाहरुख की तरह अधूरा मरा हुआँ रहेगा लेकिन इसमें ऐसा बिल्कुल नही होता क्योंकि इसका अंत पूरा सस्पेंस से भरा है।

इस फ़िल्म में आलोक पांडे

संकी और पागल की तरह रोल निभा रहें है(ड़बल रोल) और यहीं बात जब डॉक्टर(नलिन सिंह)जाँच पड़ताल कर रहें राकेश चतुर्वेदी(जो कि एक पुलिस का रोल निभा रहें हैं)को बताते है तब आलोक पांडे पर खून के इल्ज़ाम को कोर्ट ख़ारिज कर लेती है क्यों क्यूँकि इनकी दिमागी हालात ठीक न होने की वज़ह से अब आप सोच रहे होंगे ख़ून का इल्ज़ाम क्यूँ लगा।

जब आलोक पांडे अपनी प्रेमिका के मोहल्ले में जाते है तब (दीक्षा गोस्वामी) बालकनी में खड़ी होती है और आलोक पांडे अपने शर्ट के बटन खोल चाकू से कुरेद-कुरेद कर लिखें नाम को उन्हें दिखाते है और यह सब देख वे ड़र जाती है तब वे अपने घर में जाकर क्षितिज मोहन (जो कि पिता का रोल निभा रहें हैं)को यह घटना बताती है”और यह सुन वे बिल्डिंग से नीचे आकर आलोक पांडे को एक थप्पड़ जड़ देते है।

और यहाँ से खूनी सिलसिला शुरुँ हो जाता है”उस थप्पड़ का बदला एक चाकू से लिया जाता है जब आलोक पांडे पुनः गुस्से में अपनी प्रेमिका के घर में घुसते है तब प्रेमिका के पिता पर चाकू से वार हो जाता है और वही उनकी मौत हो जाती है और उस गुस्से में चाकू चलते-चलते एक ही डायलॉग निकलता है “नही मरेगा नही मरेगा शाहरुख”

और अपनी किरण को भी पाएगा। जब आप फ़िल्म के अंत तक पहुँच जाओंगे तब आप असलीयत जान पाओंगे की आख़िर एक प्रेमी ने इतनी उम्दा तरीके से एक ही शरीर में ड़बल रोल कैसे निभा लिएँ और जो खास सस्पेंस की बात थी वो भी आपको अंत में पता चल जाएगी कि आख़िर कौन था इस ड़बल रोल में आलोक पांडे का साथी।

Post Credit: Durgesh Joshi

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